ईश वन्दना

वह शक्ति हमें दो दया निधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जायें ।
पर सेवा, पर उपकार में हम, निज जीवन सफल बना जायें ।
हम दीन, दुःखी, विकलों के, सेवक बन कर संताप हरें ।
जो हैं, अटके, भूले, भटके, उनको तारें, खुद तर जायें ॥

छल, दंभ, द्वेष, पाखंड, झूठ, अन्याय से निश दिन दूर रहें।
जीवन हो शुद्ध, सरल अपना, निज प्रेम सुधारस बरसावें ।
निज आन बान, मर्यादा का, प्रभु ध्यान रहे, अभिमान रहे।
जिस देश, राष्ट्र में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जावें ॥

वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जायें॥
 

 

 

व्यापारी का धर्म

मैं एक व्यापारी
व्यापार मेरा कर्म
दुकान मेरा मंदिर
ग्राहक मेरा देवता
मेहनत मेरी पूजा
ग्राहकों का संतोष
यही मेरा प्रसाद !

 

व्यापार मंडल द्वारा निर्धारित ’व्यापारी आचार संहिता

१.     हम कोई भी मिलावटी या नकली सामान नहीं बेचेंगे ।

२.     हम अपनी दुकान ठीक समय पर खोलेंगे और बंद करेंगे।

३.     हम ग्राहक से मोल-तोल नहीं करेंगे। स्टॉक सीमा से अधिक माल नहीं रखेंगे और उचित मूल्य पर ही सामान विक्रय करेंगे ।

४.    हम कम नहिं तौलेंगे । ऐसा कोई सामान अपनी दुकान में नहीं रखेंगे जो अंकित वज़न या नाप से कम हो।

५.    कर अपवंचन से दूर रहते हुए, सरकारी करों की अदायगी ठीक समय पर करेंगे।

६.     प्रत्येक ग्राहक को भगवान समझ कर उससे सम्मानपूर्ण व मधुर व्यवहार करेंगे। अपने व्यवहार में धर्म, सत्यता और  ईमानदारी का पूर्ण पालन करेंगे। अपने कर्मचारियों से भाई जैसा व्यवहार करेंगे।

७.    प्रत्येक व्यापारी की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझेंगे। किसी व्यापारी की शिकायत अन्य से नहीं करेंगे। व्यापार मंडल से आदेशों व कार्यक्रमों का अनुपालन सदैव सुनिश्चित करेंगे। किसी भी व्यापारी के दुःख दर्दों को दूर करने हेतु हम अपने सारे कार्य कुछ समय के लिये स्थगित करने में कदापि नहीं हिचकेंगे।

 

संकल्प


वेद-पुराणों से लेकर अंग्रेज़ी काल तक सेठ-साहूकार
भामाशाहों की पदवियों से अलंकृत व्यापारी-समाज को
स्वतंत्र भारत में अपना खोया हुआ सम्मान व स्थान प्राप्त करने हेतु
अपने वोटों और नोटों को संगठित कर राष्ट्र की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाना होगा।

- पं. श्याम बिहारी मिश्र,  राष्ट्रीय एवं प्रांतीय अध्यक्ष (सांसद)

 

हथकड़ी बेड़ियां काले कानूनों की तोड़ दी जायेंगी
हर तानाशाह के तूफानों की लहर मोड़ दी जायेगी।
जो बाज़ारों की ओर उठे, वह आंख फोड़ दी जायेगी।
जो व्यापारी को चोर कहे, वह जुबां काट दी जायेगी ।


अनुशासन संगठन का मूल आधार है
कार्यालय, कोष, क्रांति रथ और समाचार पत्र संगठन की मूल-भूत आवश्यकतायें हैं
इनके अभाव में संगठन की कल्पना निरर्थक है।

हम बड़े हैं, हमारा आचार व्यवहार भी बड़ा है ऐसे अभिमान का भारी बोझ सिर पर लाद कर मूर्ख लोग, तोते, रेशम के कीड़े और बंदर की तरह बरबस पराधीन हो जाते हैं।


हमने कभी सोचा ?  कभी हमने जाना ?

*    कि हम व्यापारी स्वाधीनता के बाद से मुनाफाखोर और जमाखोर क्यों कहलाते रहे हैं?

*    गुंडे, लुटेरे, भ्रष्ट और बेईमान सरकारी कर्मचारी हमारे ही चंदों पर चुनाव जीत कर शासन करने वाले राज नेता हमारी गाढ़ी कमाई चूस चूस कर हमें मुनाफा खोर, जमाखोर कह कर क्यों बदनाम करते हैं?

*    हम शासन को ९० प्रतिशत राजस्व देते हैं, प्रतिदिन १२ से १६ घंटे परिश्रम करते हैं। अपने कमाये धन से, सबसे अधिक सामाजिक सेवा करते हैं, भारत में ९८ प्रतिशत धर्मशालायें, मंदिर, मस्जिद, गुरद्वारे, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल हमीं ने बनवाये हैं।

*    फिर भी हमें बदनाम किया जाता है! क्यों ? क्यों?? क्यों ???
 

समाज में शान और सम्मान के साथ जीने के लिये

१. दुकान पर ’मूल्य सूची’ और ’स्टॉक सूची अवश्य टांगें और निश्चित दाम से अधिक मूल्य कदापि न लें।
दुकान में खाने वाली वस्तुओं को साफ करके ही बेचें। वस्तुओं में मिलावट करना महापाप है।
दुकान केवल समय से खोलें और समय से बंद कर दें।

दुकान पर कांटे - बाट एवम मीटर की जांच निश्चित समय पर अवश्य करा लें। कम तौलना और मापना कानून और धर्म - दोनो ही दृष्टि से गंभीर अपराध और गुनाह हैं।

दुकान पर कोई भी नकली माल न तो खरीदें और न ही बेचें और न ही अपनी दुकान में रखें। अपने ही ग्राहकों से धोखा करके हम उनसे मिलने वाला प्यार और व्यापार - दोनो ही गवां देंगे।

 

सोचें, समझें और व्यवहार में अपनायें

हमारी दुकान पर आने वाला ग्राहक हमारी बात पर अटूट विश्वास करे और हमारे व्यवहार में अपनापन अनुभव करे तो हमारी सफलता और समृद्धि निश्चित है।

हम चाहे कितना भी विज्ञापन क्यों न कर लें, एक असंतुष्ट ग्राहक द्वारा किये गये नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते। हमारे संतुष्ट ग्राहक ही हमारे सबसे श्रेष्ठ विज्ञापन कर्ता हैं।

हमें अपने व्यापार और दुकान में ग्राहकों का विश्वास जमाने में बरसों लग जाते हैं, पर विश्वास टूटने के लिये एक नन्हा सा पल या एक छोटी सी घटना काफी है।

हमारे कर्मचारी हमारे हाथ - पैर, आंख-नाक और कान हैं। अगर हमारे इन अंगों में कोई पीड़ा है तो हम सुखी कभी नहीं हो सकते।

ईमानदार, निष्ठावान और मेहनती कर्मचारी हमारे व्यापार की सर्वश्रेष्ठ, सबसे बहुमूल्य और दुर्लभ संपत्ति हैं। हमेशा उनके सुख-दुःख में अपना सुख-दुःख मानें - यह मानवता भी है और बुद्धिमत्ता भी ।

अशिक्षा और अज्ञानता सबसे बड़े पाप हैं। कानून का ज्ञान न होना आपका बचाव नहीं हो सकता।

सीखने की कोई आयु नहीं होती। अपने व्यापार में भी प्रगति करनी है तो नित्य नये होने वाले परिवर्तनों पर निगाह रखें। आने वाले कल की आहट सुनें, स्वयं को नयी तकनीकों, नयी जानकारी से सुसज्जित करें। आप कभी भी अपने को प्रतियोगिता से बाहर हो गया नहीं पायेंगे।

हमारा ग्राहक हमें अपना सबसे बड़ा हितैषी और सलाहकार माने, इसी में हमारी सफलता का रहस्य छुपा है।

ईमानदारी हमें बहुत ऊंचे, बहुत सम्मानजनक धरातल पर खड़ा कर देती है, फिर चाहे हम दुकानदार हों या ग्राहक।

जिस व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान नहीं आती, उसे कभी कोई दुकान नहीं खोलनी चाहिये।

 

 

कोर कमेटी प्रभारी सैक्टर अध्यक्ष  *   नगर कार्यकारिणी सदस्यगण   संबद्ध संस्थायें * शहीद सेनानी

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